
ब्राह्मणवाद को समझने के लिए सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि ब्राह्मण कौन होते हैं।ब्राह्मण वही है जो ब्रह्म,वेद,पुराणों एवं नीतियों का ज्ञाता है और उस ज्ञान को दूसरों तक पहुंचा कर उन्हें भी अपनी तरह ज्ञानी बनाए बिना किसी लोभ या बदले में कुछ पाने कि इच्छा के चाहें वह व्यक्ति किसी भी वर्ण का क्यों ना हो। कोई भी तथाकथित ब्राह्मण अगर उपरोक्त आचरण करता है तो ही वह वास्तविक ब्राह्मण है उसी को हमारे शास्त्रों में पूजनीय भी कहा गया है। लेकिन अगर ब्राह्मण कुछ अर्जित ही नहीं करेगा तो वो खाएगा क्या,पहनेगा क्या और अपना परिवार कैसे चलाएगा?तो इसके लिए जो भी व्यक्ति उस ब्राह्मण से ज्ञान अर्जित करता है ब्राह्मण को गुरु मानकर जितना संभव हो सके जरुरतें पूरी कर देनी चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण है या कर्म से,जब भी ये प्रश्न आप किसी ऐसे व्यक्ति से पूछेंगे जो स्वयं को जन्म से ब्राह्मण मानता होगा वह क्रोधित हो जाएगा और ये क्रोध ही उनकी अज्ञानता का सबसे बड़ा प्रतीक है।जिस मनुस्मृति के आधार पर कोई भी ब्राह्मण स्वयं को पूजनीय बताता है उसी मनुस्मृति में वर्णित है कि जन्म से हर व्यक्ति शूद्र है उसे ज्ञान एवं संस्कार देकर ही ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य बनाया जाता है और इसलिए ऊपर के तीन वर्णों को द्विज भी कहा जाता है। उस में यह भी वर्णित है कि अगर कोई ब्राह्मण आचरण से ब्राह्मण नहीं है तो वो भी ब्राह्मण कहलाने योग्य नहीं है।यहां पर भी कर्म का ही सिद्धांत कार्य कर रहा है।
लेकिन क्या आपको लगता है कि जो आज के ब्राह्मण हैं वो ब्राह्मण कहलाने योग्य हैं क्योंकि आज के समय में जो कथाएं होती हैं उनमें पहले पैसे का पेमेंट अनिवार्य है उसके बाद कथा होती है और तथाकथित ब्राह्मण रील बनाते हुए नजर आएंगे ताकि धनार्जन अच्छे से होता रहे।आज के ब्राह्मण को ज्ञान के आदान-प्रदान से कोई मतलब नहीं है क्योंकि ये पूर्णतः व्यापारी हैं,इनके मुख से वही बातें निकलेंगी जिससे इनका अच्छा धनार्जन हो जाए। आज के समय में ब्राह्मण राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाला बुद्धिजीवी नहीं व्यापारी है।आज के ब्राह्मण दक्षिणा में अपने हिस्से के लिए नाऊ से झगड़ते हुए पाए जाते।आज के ब्राह्मण चमत्कार दिखाकर नमस्कार कराते हैं और सीधा प्रभु को कॉल लगाते हैं। इनके कर्म और कांडों का कहना ही क्या खुद बांसुरी लेकर कृष्ण बन जाते हैं और बाकियों को गोपियां बनाकर नचाते हैं।सबसे ज्यादा संयम का ज्ञान यही देते हैं लेकिन हर साल एक महानुभाव यौन अपराध में अंदर जाते हैं।महिलाएं तो छोड़िए छोटे बटुक भी इनकी गिद्ध वाली नजरों से बच नहीं पाए,लेकिन विधाता की कृपा तो देखिए इनके अनुयायी इन्हें फिर भी इन्हें देवता ही मानते हैं हालांकि सभी ऐसे नहीं हैं अभी भी इनमें परशुराम और चाणक्य जीवित हैं। यह समाज को ही निर्णय लेना होगा कि उन्हें पतित ब्राह्मण चाहिए या फिर वो ब्राह्मण जो समाज को नई दिशा देकर उन्नति के पथ पर आगे बढ़ाए।

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