हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर से युवाओं के लोकतांत्रिक जन-आंदोलन का केंद्र बन गया है। अगस्त 2026 में, हजारों की संख्या में छात्र और युवा ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ (Reservation Hatao Andolan) के बैनर तले अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए सड़कों पर उतरे। यह विरोध प्रदर्शन केवल एक तात्कालिक घटना नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही उस कुंठा और निराशा का परिणाम है जो योग्यता (merit) के लगातार नजरअंदाज किए जाने के कारण देश के सामान्य वर्ग के युवाओं के मन में पनप रही थी। नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए गए प्रदर्शनों के बाद, अब नीट अभ्यर्थी हर्ष दुबे के नेतृत्व में यह नया आंदोलन खड़ा हुआ है। यह आंदोलन देश में जाति-आधारित आरक्षण की जगह एक निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता आधारित व्यवस्था की मांग कर रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा नई दिल्ली क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में धारा 144) का हवाला देकर जंतर-मंतर पर रोक लगाने और रामलीला मैदान का विकल्प दिए जाने के बावजूद, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक इन युवाओं का अपनी जगह पर डटे रहना उनके संकल्प की दृढ़ता को दर्शाता है। एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार सर्वोपरि है। श्री राजपूत करणी सेना, जनरल सेना, और चाणक्य सेना जैसे संगठनों के साथ-साथ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का इस आंदोलन को जो भारी समर्थन मिल रहा है, वह यह स्पष्ट करता है कि यह मुद्दा अब संपूर्ण राष्ट्र के विकास और भविष्य से जुड़ चुका है।
आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था और उसके परिणाम
भारत में आरक्षण की शुरुआत मुख्य रूप से सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के एक अस्थायी उपाय के रूप में हुई थी, ताकि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को दूर किया जा सके। हालांकि, आज यह व्यवस्था वोट-बैंक की राजनीति का एक ऐसा स्थायी साधन बन चुकी है जो प्रतिभाओं के साथ अन्याय कर रही है। वर्तमान में, केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में कुल 59.5% सीटें आरक्षित हैं—जिसमें अनुसूचित जाति (SC) के लिए 15%, अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 7.5%, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10% आरक्षण शामिल है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अनारक्षित (General) वर्ग के छात्रों के लिए केवल 40.5% सीटें ही बचती हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं का सबसे बड़ा तर्क यही है कि यह प्रणाली अब समानता स्थापित करने के बजाय एक ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (Reverse Discrimination) का रूप ले चुकी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विवादित इक्विटी नियमों के खिलाफ भी प्रदर्शनकारियों ने कड़ा रोष व्यक्त किया है।

जब एक मेधावी छात्र दिन-रात कड़ी मेहनत करने के बावजूद केवल अपनी जाति के कारण मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज की सीट से वंचित रह जाता है, तो इससे न केवल उस छात्र का मनोबल टूटता है, बल्कि देश को भी एक योग्य पेशेवर से हाथ धोना पड़ता है। यह अनुचित व्यवस्था देश में ‘ब्रेन ड्रेन’ (Brain Drain) का एक प्रमुख कारण बन गई है। आज भारत के प्रतिभावान युवा विदेश जाने को मजबूर हैं क्योंकि उनके अपने देश में उनकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन नहीं हो रहा है। इसके अतिरिक्त, इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि जिन वर्गों के उत्थान के लिए यह आरक्षण लाया गया था, उनके भी एक बड़े तबके तक इसका वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। आरक्षण का फायदा केवल कुछ गिने-चुने साधन-संपन्न परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उठा रहे हैं, जबकि असल जरूरतमंद आज भी इस व्यवस्था के फायदों से अनजान हैं और हाशिए पर खड़े हैं। साल 1990 के मंडल कमीशन विरोधी प्रदर्शनों और 2006 के उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी कोटे के खिलाफ हुए आंदोलनों का इतिहास भी यही गवाही देता है कि जब-जब प्रतिभा को दरकिनार किया गया है, तब-तब देश के युवाओं ने सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराया है।
योग्यता आधारित समाज और सुधार की आवश्यकता
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का उद्देश्य समाज में वैमनस्य फैलाना नहीं, बल्कि एक तार्किक और न्यायसंगत सुधार (Reform) की वकालत करना है। आंदोलन के प्रमुख आयोजकों और युवाओं ने स्पष्ट किया है कि उनका यह संघर्ष किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस खोखली प्रणाली के खिलाफ है जो राष्ट्र-निर्माण में योग्यता की अनदेखी करती है। जंतर-मंतर से उठी प्रमुख मांगों में से एक यह है कि यदि देश में किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता या आरक्षण दिया जाना है, तो उसका आधार जन्म या जाति न होकर विशुद्ध रूप से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति (Economic Status) होनी चाहिए। गरीबी, संघर्ष और अभाव किसी भी जाति में हो सकते हैं; ऐसे में एक गरीब सामान्य वर्ग के छात्र को उसके अधिकारों से वंचित रखना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायपूर्ण नहीं है।
प्रदर्शनकारियों ने एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव यह भी दिया है कि यदि आरक्षित वर्ग की सीटें योग्य उम्मीदवारों के अभाव में खाली रह जाती हैं, तो उन्हें रिक्त छोड़ने के बजाय सामान्य वर्ग के मेधावी छात्रों से भरा जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय संसाधनों और शैक्षणिक अवसरों की बर्बादी न हो। इसके साथ ही, सरकारी नीतियों और दस्तावेजों में जातिगत पहचान को अनिवार्य बनाने वाले नियमों को खत्म करने की बात भी प्रमुखता से उठाई गई है। युवाओं का मानना है कि अगर हमारा अंतिम उद्देश्य जातिवाद को जड़ से खत्म करना है, तो सार्वजनिक जीवन में बार-बार जाति का प्रमाण मांगना उस उद्देश्य को ही विफल कर देता है। सोशल मीडिया पर न्यूज़ वेबसाइट्स और इन्फ्लुएंसर्स के माध्यम से इस आंदोलन को जो व्यापक समर्थन मिल रहा है, वह बताता है कि देश का एक बड़ा वर्ग अब इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार है। दिल्ली पुलिस की भारी तैनाती, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के कड़े पहरे के बीच भी युवाओं का शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों पर अडिग रहना, यह साबित करता है कि यह कोई क्षणिक आक्रोश नहीं है। सरकार को अब इन प्रदर्शनकारियों की जायज मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सभी को गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा और समान अवसर प्रदान करके ही सच्ची समानता लाई जा सकती है। केवल योग्यता का सम्मान करने वाली नीतियां ही भारत को आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर एक मजबूत, नवीन और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकती हैं।

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